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मय सबसे बड़ा धन, माँ का दिल भगवान का घर : चिंतन प्रवाह में समाज को मिला प्रेरक संदेश

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गुजरात प्रवासी न्यूज
के.के. उपाध्याय (जितेंद्र)
चैनल हेड

बलिया (उत्तर प्रदेश), संवाददाता। आधुनिक जीवन की भागदौड़ और भौतिक सुख-सुविधाओं की होड़ में जहां अधिकांश लोग धन अर्जित करने को ही जीवन का प्रमुख उद्देश्य मान बैठे हैं, वहीं सामाजिक एवं नैतिक मूल्यों पर आधारित ‘चिंतन प्रवाह’ के माध्यम से लोगों को समय के महत्व और मातृ सम्मान का संदेश दिया गया। इस अवसर पर कहा गया कि संसार में सबसे कीमती धन समय है, क्योंकि धन तो दोबारा कमाया जा सकता है, लेकिन एक बार बीत गया समय कभी वापस नहीं आता।

वक्ताओं ने कहा कि प्रकृति का संपूर्ण संचालन समय के अनुसार होता है। सूर्योदय और सूर्यास्त से लेकर ऋतुओं के परिवर्तन तक, हर प्रक्रिया समय के अनुशासन में बंधी हुई है। मनुष्य का जीवन भी समय के साथ ही आगे बढ़ता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन के हर क्षण का सदुपयोग करना चाहिए। यह भी कहा गया कि यदि धन के बदले समय खरीदा जा सकता, तो दुनिया का कोई भी धनी व्यक्ति मृत्यु को टाल सकता था और अपनी आयु बढ़ा सकता था, लेकिन ऐसा संभव नहीं है। यही कारण है कि समय को जीवन की सबसे अमूल्य पूंजी माना गया है।

कार्यक्रम में उपस्थित लोगों को प्रेरित करते हुए कहा गया कि अपने बहुमूल्य समय को केवल व्यक्तिगत लाभ और भौतिक सुखों तक सीमित न रखें, बल्कि उसका उपयोग ईश्वर भक्ति, समाज सेवा, जरूरतमंदों की सहायता और मानव कल्याण के कार्यों में करें। ऐसे कार्य न केवल व्यक्ति के जीवन को सार्थक बनाते हैं, बल्कि समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने का माध्यम भी बनते हैं।

इस दौरान माँ के महत्व पर भी विस्तार से प्रकाश डाला गया। वक्ताओं ने कहा कि माँ का दिल भगवान का घर होता है, जिसमें केवल प्रेम, त्याग, ममता और दया का निवास होता है। माँ अपने बच्चों के जीवन में वह शक्ति है, जो हर परिस्थिति में उनका साथ देती है। वह अपने बच्चों की खुशियों के लिए स्वयं के सुखों का त्याग करने में भी पीछे नहीं हटती। एक माँ अपने बच्चों को जन्म देने से लेकर उनके पालन-पोषण, शिक्षा, संस्कार और जीवन निर्माण तक हर स्तर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

वक्ताओं ने कहा कि आज समाज में ऐसे कई उदाहरण देखने को मिलते हैं, जहां माता-पिता अपने बच्चों के लिए पूरी जिंदगी संघर्ष करते हैं, लेकिन वृद्धावस्था में उन्हें अपेक्षित सम्मान और स्नेह नहीं मिल पाता। यह सामाजिक चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि एक माँ दस बच्चों का पालन-पोषण कर सकती है, लेकिन कई बार दस बच्चे मिलकर भी अपनी माँ की सेवा और देखभाल नहीं कर पाते। यह स्थिति समाज के नैतिक मूल्यों में आ रहे बदलाव को दर्शाती है।

कार्यक्रम के माध्यम से युवाओं और समाज के सभी वर्गों से अपील की गई कि वे अपने माता-पिता, विशेष रूप से माँ के प्रति सम्मान, कृतज्ञता और प्रेम का भाव बनाए रखें। माता-पिता की सेवा को सबसे बड़ा धर्म बताते हुए कहा गया कि उनके आशीर्वाद से जीवन में सफलता, सुख और समृद्धि प्राप्त होती है।

अंत में यह संदेश दिया गया कि समय और माँ, दोनों ही जीवन की ऐसी अनमोल धरोहर हैं, जिनका कोई विकल्प नहीं है। समय का सदुपयोग और माँ का सम्मान ही एक सफल, संस्कारित और सुखी समाज की पहचान है। यदि प्रत्येक व्यक्ति इन दोनों मूल्यों को अपने जीवन में अपनाए, तो समाज में प्रेम, सद्भाव और मानवीय संवेदनाओं का विस्तार होगा।

प्रेषक:
के.के. उपाध्याय (जितेंद्र)
चैनल हेड, गुजरात प्रवासी न्यूज

स्थान : बलिया, उत्तर प्रदेश
विशेष स्तंभ : चिंतन प्रवाह – बदलता हमराह

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