लखनऊ, उत्तर प्रदेश।
केंद्र सरकार द्वारा पुराने 29 श्रम कानूनों को हटाकर बनाए गए चार नए लेबर कोड को लागू हुए काफी समय बीत चुका है। इनका उद्देश्य कर्मचारियों को समय पर वेतन, सुरक्षित कार्य वातावरण, सामाजिक सुरक्षा और स्पष्ट अधिकार उपलब्ध कराना था।
लेकिन आउटसोर्सिंग और संविदा कर्मियों की जमीनी स्थिति में अब तक कोई ठोस सुधार नजर नहीं आता।
नए नियमों के अनुसार समय पर वेतन और ओवरटाइम का भुगतान अनिवार्य है, किंतु वास्तविकता यह है कि आउटसोर्सिंग कर्मचारी आज भी वेतन के लिए विभागों और एजेंसियों के चक्कर लगाने को मजबूर हैं।
महिलाओं के लिए नाइट शिफ्ट की सुरक्षा का प्रावधान भी कागजों तक सीमित दिखाई देता है—जिम्मेदारी लेने को न ठेकेदार तैयार, न विभाग।
ग्रेच्युटी के नियमों में बड़ा बदलाव करते हुए एक वर्ष की नौकरी पर इसका अधिकार दिया गया था, लेकिन संविदा कर्मचारियों को ‘कर्मचारी’ की श्रेणी में ही नहीं माना जाता, जिससे वे इस लाभ से वंचित रह जाते हैं।
इसी तरह, प्रत्येक कर्मचारी को नियुक्ति पत्र देने का नियम स्पष्ट है, फिर भी कई विभागों में श्रम कानून का नाम आते ही अधिकारी जिम्मेदारी से बचने का प्रयास करते हैं।
स्थिति यह है आउटसोर्सिंग कर्मचारी प्रतिदिन वेतन, सुरक्षा, छुट्टी, सामाजिक सुरक्षा और स्थिरता जैसी मूलभूत मांगों को लेकर भटक रहे हैं, लेकिन समाधान अभी भी दूर है।
इन हालातों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है—
जब नियमों का पालन करने वाला कोई नहीं, तो नए लेबर कोड लागू करने का वास्तविक लाभ आखिर किसे मिल रहा है?
क्या आउटसोर्सिंग और संविदा कर्मी इन कानूनों का कोई फायदा देख पाएंगे, या सब कुछ केवल फाइलों और रिपोर्टों तक सीमित रह जाएगा?
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